मुखपत्र

कही-सुनि : मन की गांठ

गांठ, नकारात्मक शब्द भी है और सकारात्मक भी। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि में गांठ शब्द को नकारात्मक रूप में लिया जाता है। गांठ की समय पर पहचान और चिकित्सा नहीं हो, तो यह कैंसर भी बन जाती है। शरीर की गांठ का प्राय:-प्राय: प्रत्येक चिकित्सा पद्धति में उपयुक्त उपचार उपलब्ध है, परंतु मन/दिल में जो विकारों की गांठ है, उसका उपचार अभी तक विज्ञान में उपलब्ध नहीं है। विकारों की गांठ ही सबसे खतरनाक होती है। यदि यह गांठ, धनबली या बाहुबली या सत्ताबली के मन में हो और वह चतुर नहीं हो अर्थात नेत्र मूंद कर केवल अपनी चापलूस सलाहकार मंडली (जिसमें केवल खानाखराब अफसर ही भरे हों)  की बात को ही अंतिम सत्य मानता हो, तो फिर वह विवेकहीन की भांति व्यवहार करता है और कभी-कभी खुद भी नुकसान उठाता है। विकारों की गांठ, जिसके मन में पैदा होती है और जिसके लिए पैदा होती है, दोनों का सुख-चैन छीन लेती है। यदि ये गांठ शक्तिप्राप्त व्यक्ति के मन हो तो, अफसरों का बोरिया-बिस्तर बंधते देर नहीं लगती। दो महीने पहले, मुखिया जी के मन की ऐसी ही गांठों के कारण बीसियों अफसरों को अपने घरों से कोसो दूर ठिकाना बनाने पर मजबूर होना पड़ा।

लेकिन, ऐसा नहीं कि गांठ सदैव खतरनाक ही होती है। मानव और अन्य जीवों के शरीर में सकारात्मक गांठे भी पाई जाती हैं, जिन्हें जीवन रक्षा के लिए जरूरी माना गया है। इनमें लसीका गांठें, तंत्रिका गांठें, हृदय की गांठ (सैल्यूटरी नोड्स) मुख्य हैं। वनस्पति विज्ञान में गांठ, पौधे के तने का वह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां से पत्तियां, शाखाएं, कलियां और फूल निकलते हैं। पौधे के विकास के लिए गांठों का होना अनिवार्य है। गुलाब, गन्ना और मनी प्लांट जैसे पौधों में नया पौधा उगाना है, तो तने की कटिंग में कम से कम एक गांठ का होना अनिवार्य है।

हिन्दी साहित्य और लोकजीवन में ‘गांठ’ शब्द का प्रयोग बंधन, प्रेम, रिश्तों की दरार, और किसी बात को हमेशा याद रखने (गांठ बांधना) के संदर्भ में बहुत सुंदर ढंग से हुआ है। गांठ पर रहीम दास का प्रसिद्ध दोहा हैं :- ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ परि जाय।’

इधर, मुखिया जी के मन की गांठ है कि खुल ही नहीं रही। शायद इसलिए भी, क्योंकि यह तय कर लिया गया है कि गांठ को खोलना ही नहीं है। वरना गांठ का अपना क्या? हम चाहें और गांठ ना खुले, ऐसा हो ही नहीं सकता। गांठ तो हमने बांधी है, अपने विकारों से। अपने अज्ञान को, अधूरेपन को ढांपने के लिए। हम अधूरे थे, किसी ने हमें हमारा अधूरापन दिखा दिया। हमें अपने अधूरेपन से शिकवा नहीं है। शिकवा उस व्यक्ति से है, जिसने हमें हमारा अधूरापन दिखा दिया। हमसे हमारा अधूरापन तो दूर हुआ नहीं, उसमें पूर्णता तो नहीं आई लेकिन हमने अपने अधूरेपन को भरने के लिए सामने वाले को ‘रिक्त’ करना ठान लिया।

कलयुग में साफगोई कितनी खतरनाक हो सकती है, ये उन अफसरों से पूछिए जो स्वेच्छा से सरकारी सेवा को त्याग कर घर जाना चाहते हैं, लेकिन मन में विकारों की गांठ बांधकर बैठे मुखिया जी उन्हें ‘सूखा’ घर नहीं देना चाहते क्योंकि अफसर ने, किसी समय, बातों-बातों में, अनजानपने में मुखिया जी के अधूरापन का जिक्र कर दिया। मुखिया जी से यह अधूरापन तो दूर हुआ नहीं, लेकिन नैतिकता की, भाषा की, शब्दों की मर्यादा भूल गए। ये तो भला हो शैतान सिंह का, जिसने मुखिया जी को उन्हीं के घर में बोलने का अंदाज सिखा दिया। मुखिया जी को भी तभी पता लगा कि अपने विभाग के निरीक्षक और खाकी वाले निरीक्षक में क्या अंतर होता है। इससे पहले तो वे गधे-घोड़े में फर्क नहीं कर पाते थे और विभाग में ‘टके सेर भाजी, टके सेर खाजा’ वाली कहावत लागू थी, खैर ये कहावत तो आज भी लागू है। भाजी अर्थात सब्जी और खाजा, एक प्रकार की मिठाई। भारतेंदु हरिश्चंद्र के प्रसिद्ध नाटक ‘अंधेर नगरी’ के इस लोकप्रिय मुहावरे का अर्थ है कि जहां का राजा या मुखिया मूर्ख और विवेकहीन हो, वहां न्याय और अन्याय, अच्छी और बुरी या सस्ती और महंगी चीजों का कोई भेद नहीं होता। ऐसी व्यवस्था में हर वस्तु एक ही भाव (अन्यायपूर्ण तरीके से समान मूल्य) पर मिलती है, जिससे वहां अराजकता फैल जाती है। यही कारण है कि विभाग में आज गधे डरबी दौड़ रहे हैं और घोड़े भार ढो रहे हैं।

विषय का ज्ञान नहीं रखने वाले ऐसे अज्ञानी मुखिया को कोई अफसर ज्ञान की बात या नियम बता दे, और वह मुखिया ज्ञान देने वाले की नौकरी खाने की ही गांठ बांध लें तो अफसर बेचारा क्या करे? हर कोई अफसर शैतान सिंह तो नहीं होता। बहुत से शरीफ मोहम्मद भी होते हैं और ऐसे शरीफों को अक्सर उनके घर से कोसो दूर, पटक दिया जाता है या गुलाबी नगरी में बुला लिया जाता है ताकि अफसरों के जीवन में परिवार की खुशियों की जो गुलाबी महक है, उसे सुबह-शाम की डांट-डपट में बदल कर, उनकी शेष बची राजकीय सेवा को नरक में बदला जा सके।

वैसे एक बात है कि मुखिया जी दंडित करने में भेद नहीं करते। एकदम समदर्शी की भांति काम करते हैं। सामने वाला चाहे कुसूरवार हो या बेकुसूर। चापलूस अफसर ने एक बार कान भर दिए जो फिर सच और झूठ में भेद करना भी भूल जाते हैं। सीधी कील पर ही हथौड़े का वार अधिक होता है। जिन कीलों में आकंठ चापलूसी का टेढ़ापन होता है, जो कहीं पर भी, कितनी भी डिग्री में डेढ़ा होने (झुकने और साष्टांग दंडवत होने) का हुनर रखते हैं वे सिविल लाइन में या सचिवालय में सुरक्षित स्थान पा लेते हैं। और जो सीधी कील की भांति, अपने स्वाभिमान में सीना ताने सीधे खड़े रहते हैं, उन्हें ठोक दिया जाता है।

रहीम जी कहते हैं – ‘जहां गांठ तहं रस नहीं, यह रहीम जग जोय। मंड़ए तर की गांठ में, गांठ गांठ रस होय। ’ अर्थात साधारण जीवन में रिश्तों की गांठ (मनमुटाव) मिठास खत्म कर देती है, लेकिन विवाह के मंडप में जो गठबंधन की गांठ होती है, उसके पोर-पोर में प्रेम-रस भरा होता है। यदि गांठ ही बांधनी है तो फिर प्रेम रस की बांधें, इसी से जीवन में समरसता आएगी। सत्ता की शक्ति तो क्षण-भंगुर है। क्या पता, किस दिन घर भेज दिए जाएं। कोई वीआरएस के लिए आवेदन नहीं, कोई अधिवार्षिकी आयु पूर्ण करने के उपरांत सेवानिवृत्ति नहीं, रातों-रात सीआरएस और खेल खत्म। इधर खेल खत्म, उधर चापलूस रूपी कुत्ते गायब।

चिकित्सा विज्ञान कहता है कि गांठ नहीं खुले तो कैंसर बन जाती है। मन की गांठें खोलने का सर्वोत्तम उपाय है क्षमा करना और मांगना। हर पुराने विचार या पूर्वाग्रह को अंतिम सत्य न मानें, बल्कि नई सकारात्मक सोच को अपनाएं। मुखिया जी को हमारा परामर्श है कि हमारी न सही, स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई की ‘आओ मन की गांठे खोलें’ शीर्षक से लिखी कविता अवश्य पढिएगा, शायद गांठ खोलने की प्रेरणा मिल जाए।

(प्रस्तुत इमोजी सोशल मीडिया से साभार)

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