मुखपत्र

कहि-सुनी : दिल के अरमां आंसुओं में बह गये…..

को-ऑपरेटिव सर्विस के एक बहुचर्चित अफसर की कार्यप्रणाली के बहुत चर्चे हुआ करते थे। किसी संस्था में मनचाहा पद प्राप्त करने के लिए उनका एक निश्चित सूत्र था और उनके सेवा में रहते हुए वो सूत्र कभी फेल नहीं हुआ। मंत्रियों को दायीं-बायीं पॉकेट में रखने वाले ये साहब जिस पद की तमन्ना करते थे, उसे पाने के लिए उसी सूत्र का बहुत सफलतापूर्वक उपयोग करते थे। सूत्र ये था कि वो जिस पद का कब्जाना चाहते थे, पहले तो उस सीट पर काबिज व्यक्ति की छवि खराब करते, उसके बाद उस सीट के प्रबल दावेदार की छवि खराब करते। फिर, मौका देखकर अपना नाम चला देते। बस यूं करते हुए उन साहब ने एक से बढक़र एक, मनचाहे पद पाये, खूब कैश बनाया, खूब ऐश की, हर समय हवा में ही रहे, लेकिन सेवाकाल के अंतिम समय में उनकी हसरतों का प्लेन क्रेश हो गया और साहब का वजूद ऐश (राख) हो गया।

हमारे बड़े साहब ने पूरे सेवाकाल में इसी सूत्र को अपनाया और अपने अलावा, अपने चेलों-चमकों को भी इसी सूत्र के दम पर मलाईदार पदों पर बैठाने की व्यवस्था की। हाल के दिनों में ऐसी ही कवायद फिर शुरू हुई, लेकिन अदालत के एक अंतरिम आदेश के बाद, गुलाबी नगर स्थित सहकारी कमांड सेंटर में नकारात्मकता से लदकद इन बड़े साहब के ‘दिल के अरमां (अरमान) आंसुओं में बह गये’।

वैसे तो बड़े साहब बड़े ही मंझे हुए गेंदबाज हैं, जिनकी फेंकी हुई गुगली से अब तक कई अफसर क्लीन बोल्ड हो चुके हैं। बड़े साहब, सहकारी आंदोलन की सबसे छोटी इकाई से सम्बंधित एक अर्थहीन प्रकरण को कई अफसरों के लिए अनर्थकारी बनाने में पूरी शिद्दत के साथ जुटे हुए थे, परन्तु अब बड़े साहब का हिडन एजेंडा जिम्मेदार लोगों के समक्ष जगजाहिर हो गया। गलत एवं आधा-अधूरा फीडबैक देने के मामले का खुलासा होने के बाद बड़े साहब मन मसोस कर रह गये हैं।

बड़े साहब में सृष्टि के पालनहार भगवान नारायण के दो रूपों की एक साथ झलक देखने को मिलती है। नाम से तो नारायण के सातवें अवतार का स्मरण कराते हैं और उनके ईष्ट नारायण के आठवें अवतार हैं, लेकिन कर्म, नाम के ठीक विपरीत हैं यानी ‘आंख के अंधे और नाम नयनसुख।’ उच्च कुल में जन्म लेकर भी मन का मैल नहीं धो पा रहे। यदि कर्म से पहचान की जाये तो वे कौरवों के ही रिश्तेदार लगते हैं, जो पाण्डवों को पांच गांव (पद) भी देना नहीं चाहते और सहकारिता रूपी हस्तिनापुर पर अपने ही दुर्योधनों और दुशासनों को राज कराना चाहते हैं। बड़े साहब यदि कम्पीटिशन फाइट करके सेवा में आये होते तो अचेतन मन से भी उन व्यक्तियों के मर्म को, संघर्ष को, महसूस कर पातेे, जिन्होंने जी-तोड़ मेहनत करके आरएएस का पेपर क्रेक किया और फिर गजटेड ऑफिसर बने। किसी प्राकृतिक घटनाक्रम के कारण घर बैठे-बिठाये नौकरी मिल गयी, इसलिए उनकी हरकतें ‘जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई’ वाली कहावत को सच करने जैसी हैं।

बड़े साहब ने सहकारिता आंदोलन की सबसे छोटी इकाई के एक मामले को तूल देकर, कई अफसरों को लपेटने के लिए बड़ी ही चतुराई से एक पुराने प्रपत्र में नीयतन कांट-छांट कर अत्यंत ही दुरूह, लम्बा-चौड़ा और अनुपयोगी प्रपत्र जारी किया, यह जानते हुए कि इसमें वर्णित बिन्दुओं की पालना किया जाना सम्भव ही नहीं है। उनका हिडन एजेंडा यही था कि सूचनाएं एकत्र करने के नाम पर इस मेटर को जितना संभव हो सके, लटकाया जाये, क्योंकि उनका लक्ष्य ही जांच के नाम पर कुछ अफसरों को बदनाम करके तब तक चर्चा में लाना था, ताकि भविष्य की तबादला सूची में टारगेटेड अफसरों का नाम सबसे पहले हो। बड़े साहब को, अफसरों को डरा कर, दबाकर रखने में जिस ‘परमानंद’ की अनुभूति होती है, वो अवर्णिय है, अकथनीय है, अकल्पनीय है। बड़े साहब को मालूम है कि ‘बद से बदनाम बुरा’ होता है, इसलिए नाम उछाल कर बदनाम करने में उनका अटूट विश्वास है। निश्चित तौर पर किसी जन्म में शकुनि मामा की टीम में शामिल रहे होंगे।

हाल के दिनों में बड़े साहब ने अपने किचन केबिनेट के सहयोगियों के साथ मिलकर पहले पूरी पटकथा लिखी, फिर जातिभाई की मदद से अखबारों में छपी और फिर तयशुदा कार्यक्रम के अनुरूप, मुखिया जी और मातृ शक्ति की कानसेवा करके जांच कमेटी बनायी गयी। अपने लोगों को गुलाबी नगरी में चुनिंदा बड़े पद दिलाने के लिए चंद्रकांता सीरियल की भांति तिलस्म बुना गया, ताकि मौजूदा अफसरों को हटाने के लिए माहौल बनाया जाये। पिछले वाले साहब थे तो बहुत अच्छे लेकिन कान के कच्चे थे, इसलिए बड़े साहब उनके कंधे पर बंदूक रखकर चलाते रहे। सहकारिता में बड़े साहब का डंका बजता रहा। अब मातृशक्ति के आने से माहौल बदल गया। हालांकि, शुरूआती दौर में, शीर्ष मातृशक्ति को बरगलाने में सफल भी हो गये, लेकिन झूठ के पांव कहां टिकते हैं। जल्द ही सच्चाई सामने आ गयी और बड़े साहब के आडम्बर का पर्दाफाश हो गया। उच्च पदों पर बैठने वालों को यकीन हो गया कि बड़े साहब ने आधी-अधूरी जानकारी देकर भ्रमित किया। सुना है कि मातृशक्ति ने तलब कर बड़े साहब को ऐसा हडक़ाया कि अरमान और जोश दोनों ठंडे पड़ गये हैं। परन्तु हमारे बड़़े साहब हार मानने वाले नहीं हैं। सुना है कि अदालत के आदेश की मनमानी व्याख्या कर नया प्रपत्र तैयार कर रहे हैं। (अगली कड़ी में बड़े साहब की अजब-गजब किचन केबिनेट)

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