ये रिश्ता क्या कहलाता है…..
मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान उर्फ मिर्जा गालिब ने कहा था, दुनिया में बेवकूफों की कमी नहीं गालिब, एक ढूंढो हजार मिलते हैं। सहकारिता का संसार अलग है। इसलिए, हम कह सकते हैं कि सहकारिता में फनकारों की कमी नहीं गालिब, एक ढूंढों, हजार मिलते हैं। गुलाबी नगर में ही बाइस गोदाम सर्किल से लेकर नेहरू बालोद्यान तक, बनी पार्क से लेकर झालाना के जंगलों और सिविल लाइंस तक, हर जगह फनकार भरे हुए हैं। सबमें अलग-अलग फन छुपा हुआ है। यहां हम नाग के फन की चर्चा नहीं कर रहे, कला की बात कर रहे हैं।
इन दिनों सहकारिता के शीशमहल के एक फनकार की प्रभावशीलता की पूरे सहकारी जगत में चर्चा जोरों पर हैं। कुछ समय पहले मुखिया जी ने सार्वजनिक रूप से इस फनकार को चोर, डाकू और किसानों का दुश्मन बताया था और किसानों से जुड़े एक महत्ती मामले से दूर रखने की घोषणा की। एक वो समय था जब मुखिया जी फनकार को बर्खास्त किये जाने पर आमादा थे, अब यह हालत है कि फनकार जी न केवल ससम्मान बहाल कर दिये गये, अपितु फिर से उसी कमेटी में नामित कर, उनकी प्रभावशीलता और कर्मठता को प्रभावी ढंग से महिमा मंडित किया जा रहा है। ये सब सिविल लाइन वालों की इच्छा की विपरीत हुआ होगा, ऐसा संभव ही नहीं है। बताते हैं तब मुखिया जी की इच्छा पर, तत्कालिन ज्ञानी जी ने अपने स्तर पर फनकार को बहाल कर दिया। हालांकि, खुर्राट मैडम जब नीतीश प्रदेश से लौट कर आयी, तब इस मैटर को लेकर कई दिन तक ज्ञानी जी के हलक से पानी नीचे नहीं उतरने दिया था।
विषय पर लौटते हैं। फनकार जी हो या अन्य सहकारी अधिकारी, मुखिया जी के साथ इनके रिश्ते, कुछ-कुछ टीवी के एक डेली सोप ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ जैसे हैं। जब-तक, सब-कुछ ठीक-ठाक चलता है, रिश्ते मधुर और सामान्य रहते हैं, जैसे ही छींटे मुखिया जी की ओर उडऩे लगते हैं, वे अफसर को ही उड़ा देते हैं। बनी पार्क वाले दफ्तर की मैडम, बाहड़मेर वाले अफसर, शीशमहल वाले ज्ञानी जी और उनके प्रिय सखा, शीशमहल के निवर्तमान कमांडर… आदि-आदि न जाने कितने ही उदाहरण हैं, जब समर्पित अफसरों को मुखिया जी ने दूध से मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया।
सालों-साल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ धारावाहिक देखने के बावजूद, दर्शक यह अंदाजा नहीं लगा पाते कि कौन पात्र सही है, कौन गलत। नायरा और कार्तिक गोयनका की इस कहानी में समय-समय पर परिस्थितियां इतनी उलझ जाती हैं कि कौन रिश्तेदार मित्र है औरकौन शत्रु, कुछ समझ नहीं आता। वर्तमान संदर्भ में बात करें तो हमारी सहकारिता के कई किस्से कहानियों की भांति मुखिया जी और फनकार का रिश्ता भी नायरा और कार्तिक के रिश्ते जैसा ही है।
फनकार की कर्तव्य के प्रति उदासीनता और घोर लापरवाही साबित होने के बाद, मुखिया जी ने जीरो टॉलरेंस का एग्जांपल सैट करने के लिए फनकार को न केवल आधे वेतन पर घर भेजा, बल्कि अनुशासन का पाठ पढाने के लिए षोडष दस्तावेज भी दिलाया। तदोपरांत, आश्चर्यजनक रूप से अल्पावधि में ही, शोडष दस्तावेज को पेंडिंग रखते हुए, फनकार को ससम्मान अपने पद पर बहाल कर शीशमहल में बुला लिया गया। इस दौरान समकक्ष दूसरे फनकार और निवर्तमान ज्ञानी जी के परम प्रिय सखा को ‘बिना काम, पूरा वेतन’ फार्मूले पर घर भेज दिया गया, तो फनकार को दूसरे बड़े पद की जिम्मेदारी भी दे दी गयी।
कहां तो बर्खास्तगी और कहां शीशमहल के दूसरे स्तर के दो बड़े पदों की एक साथ जिम्मेदारी और उसी कमेटी में फिर से मनोनयन। जिस व्यक्ति की लापरवाही और आचरण से धरतीपुत्रों को 54 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंंचा, वही अब शीशमहल का पहले से अधिक प्रभावशाली अधिकारी बना बैठा है। मुखिया जी के यहां प्रवेश पर प्रतिबंध भी वापिस ले लिया गया है। उसी फनकार से सारा ज्ञान लिया जा रहा है। मुखिया जी को पता है कि फनकार दबाव में है। जब तक शोडष दस्तावेज का निपटारा नहीं होगा, फनकार से जैसा चाहेंगेे, वैसा काम लेंगे।
मुखिया जी को इस बात का बड़ा मलाल है कि मामूली सिपाही होने के बावजूद फनकार ने पिछली बार मुखिया जी के हिस्से में से कुछ मक्खन छाछ में छिपा कर रख लिया था। बदले हुए हालात में, सजग मुखिया जी, इस बार अपने हिस्से का पूरा मक्खन सुरक्षित रखने के साथ-साथ फनकार को भी दोष मुक्त किये जाने का रास्ता बनाने में जुट गये हैं। फनकार को पुन: उसी कमेटी का प्रभावशाली सदस्य बनाये का मतलब ही उसके पिछले गुनाह को हल्का करना है। इसी से अनुशासनात्मक कार्यवाही में दोषमुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा।
मुखिया जी को भली-भांति समझने वाले सहकारजन फनकार को ही कमेटी में शामिल किये जाने का एक और पुख्ता कारण भी बताते हैं। वो ये कि यदि फनकार की जगह किसी नये सदस्य को जिम्मेदारी दी जायेगी, तो उसे सारा खेल समझाना पड़ेगा। नया व्यक्ति यह जान जायेगा कि इस हमाम में कौन-कौन, कितना वस्त्रहीन है। ऐसा वे हरगिज नहीं चाहेंगे। वैसे भी, बुजुर्ग कह गये हैं – किसी को मार डालने से अच्छा है, उसे डरा कर रखा जाये। डरा हुआ व्यक्ति अधिक निष्ठा से काम करता है। इति! ((प्रस्तुत इमोजी सोशल मीडिया से साभार)

