कहि-सुनी : हनीमून पीरियड वाले पद और AEBAS
रूपहले पर्दे के महानायक अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘डॉन’ को रिलीज हुए 48 वर्ष हो चुके हैं। चंद्र बरोट निर्देशित, 12 मई 1978 को रिलीज, ‘डॉन’ का एक अत्यंत प्रचलित संवाद है, जिसमें ‘डॉन’ यानी अमिताभ कह रहे हैं कि डॉन के पीछे तो 11 मुल्कों की पुलिस लगी है, लेकिन डॉन को पकडऩा मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
यह फिल्मी डायलॉग सहकारिता पर अक्षरश: लागू होता है। सहकारिता को समझना, डॉन को पकडऩे से अधिक दुश्वार है। क्योंकि यह राज्य सरकार के बाकी विभागों की तरह, वातानुकूलित कमरों में बैठकर चलाया जाने वाला विभाग नहीं, बल्कि यह हमारे सामाजिक ताने-बाने में, गांव-गुवाड़ की गलियों की मिट्टी में रची-बसी हुई एक परम्परा है, जिसका किसानों, पशुपालकों और ग्रामीणों के सामाजिक-आर्थिक उन्नयन में अमूल्य योगदान है। यह फील्ड का मूवमेंट है। अमूल, इफको, कृभको, सरस, नंदनी, मिल्मा, विसाखा, लिज्ज्त पापड़, उरालुंगल, इत्यादि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
सूझवान और संवेदनशील अधिकारी डॉक्टर साहब के लिए भी सहकारिता को समझने में बेशक मुश्किल पेश आ रही हो, लेकिन एक विभाग के रूप में उन्होंने इसे अपनी ज्वाइंनिंग के दिन ही समझ लिया था, जब विभाग में उनके पदार्पण के दिन ही, आधा सैंकड़ा अधिकारी, कर्मचारी ड्यूटी से नदारद पाये गये। दुस्साहस से भरे हुए, ऐसे बैखौफ सरकारी मुलाजिम उन्होंने कहीं नहीं देखे थे।
कुछ ही दिन में डॉ. साहब को उन विभागीय पदों का गणित भी समझ आ गया है, जिस पर पोस्टिंग मिलने को संकेतों की भाषा में ‘हनीमून पीरियड’ कहा जाता है। खंड मुख्यालय और जिला मुख्यालय पर ऑडिट से जुड़े पदों को इसमें सबसे ऊपर रखा जाता है। संस्थाओं में डेपुटेशन वाले पद, विशेषकर, पावर में नम्बर-टू पद इस श्रेणी में आते हैं। किसी को बड़ी नौकरी या बड़े पद की तैयारी करनी हो तो वह जिला मुख्यालय पर ऑडिट विंग में लगना पंसद करता है। सहकारी संस्थाओं के लिए ऑडिट कभी सबसे महत्वपूर्ण अंग हुआ करती थी, लेकिन अब ये किताबी बातें हैं। ऑडिट कार्यालयों में लेखा परीक्षा रिपोर्ट पढऩे, अनियमितता/गबन पाये जाने पर एक्ट के तहत एक्शन लेने और ऑडिट पैरों को ड्रॉप करने का रिवाज समाप्त हो चुका है। अब तो जिन कंधों पर ऑडिट की जिम्मेदारी है, उनमें से अधिकांश को कोऑपरेटिव का ‘सी’ और एकाउंटिंग का ‘ए’ नहीं आता। यही हाल यूनिट कार्यालयों का है, जिनके सिपाहसालारों को एक्ट का ‘ए’ एक नहीं आता। इसका एक बड़ा कारण अरुचि, और दूसरा बड़ा कारण गुणवत्तापूर्ण एवं सतत प्रशिक्षण का अभाव है। वर्तमान में तो ट्रेनिंग देने वाले संस्थान में ऐसे-ऐसे ट्रेनर हैं, जिन्हें खुद को ही ट्रेनिंग का ‘टी’ नहीं आता। पिछले एक-दो साल का रिकार्ड बता देगा कि बहुतायत में भरे हुए इन ट्रेनरों द्वारा स्वयं किस-किस विषय पर ट्रेनिंग दी गई है। सहकारिता के शीशमहल वाले मामूली कार्मिक भी ट्रेनर बने हुए हैं।
चार्टेड एकाउंटेंट हो या विभागीय ऑडिटर, ऑडिट के उपरांत गबन/वित्तीय अनियमितता सामने आने पर, जब तक ऑडिट करने वालों की जिम्मेदारी निर्धारित नहीं होती, तब तक इन पदों को ‘हनीमून’ की कैटेगिरी से बाहर निकालना डॉक्टर साहब के लिए भी चुनौती ही बना रहेगा।
वर्तमान में मूल मुद्दा कार्य संस्कृति की बहाली का है, जिसके लिए जिम्मेदारों को सीट पर टिकना अनिवार्य है। निश्चित रूप से डॉ. साहब ने सहकार के सेवादारों में कर्तव्य के प्रति समर्पण के अभाव के साथ-साथ यह भी देखा होगा कि ये लोग कार्यालय समय में भी ड्यूटी करने को शान के खिलाफ मानते हैं। ऐसे ही एक वरिष्ठ महाशय, सहकारिता के शीशमहल की शानो-शौकत को छोडक़र, प्रधान कार्यालय में दफ्तर-दर-दफ्तर डोलते नजर आया करते थे। वर्षों से प्रधान कार्यालय में रहने के कारण, उनका भौतिक शरीर ही शीशमहल गया था, लेकिन उनका चंचल मन, गप्पें हांकने और गुटखा फांकने के लिए नेहरू सहकार भवन के गलियारों में भटकता रहता था। अब भी झालाना के जंगलों के बहुतेरे शेर, सहकार भवन में विचरते नजर आते हैं।
संभवत: इसी फीडबैक ने आधार इनेबल्ड बायोमीट्रिक अटेंडेंस सिस्टम (एईबीएएस) से अनिवार्य उपस्थिति के विचार को जन्म दिया। इसी प्रकार, तीन करोड़ रुपये से अधिक खर्च से हुए नेहरू सहकार भवन के नवीनीकरण के मात्र डेढ़ साल बाद ही यदि यहां सफाई अभियान चलाना पड़ रहा हो तो यह हमारी नकारात्मक मानसिकता को ही दर्शाता है।
अल्पसमय में ही डॉक्टर साहब को यह तो भान हो गया कि यहां बहुत से लोग लातों के ही भूत हैं। समय पर ड्यूटी के लिए पाबंद करने हेतु बार-बार टोकने पर भी जब टोंक वाले साहब नहीं सुधरे, तो उन्हें अनुशासनात्मक कार्यवाही के डंडे से ठोकना ही पड़ा। याद-व साहब का उदाहरण लंबे समय तक याद रखा जाना चाहिये।
कवि संजय झाला ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम में सरकारी कार्य संस्कृति की बदहाली पर इस प्रकार चुटकी ली –
जिस दिन अफसर होता है, उस दिन बाबू नहीं होता,
जिस दिन बाबू होता है, उस दिन अफसर नहीं होता,
जिस दिन अफसर और बाबू दोनों होते हैं, उस दिन काम नहीं होता,
और
जिस दिन काम होता है, उस दिन दोनों नहीं होते….!
((प्रस्तुत इमोजी सोशल मीडिया से साभार)

