कही-सुनि : सहकारिता के शीश महल में रोजगार उत्सव और मीडिया मैनेजमेंट
एक बार की बात है, एक महात्मा स्नान के लिए नदी में नहाने के लिए उतरे, तो उन्होंने देखा कि एक बिच्छू पानी में डूब रहा है। उन्होंने जैसे ही बिच्छू को पानी से बाहर निकालने के लिए अपने हाथ पर रखा, बिच्छू ने उन्हें डंक मार दिया। डंक से असहनीय दर्द हुआ, तो महात्मा ने हाथ झटक दिया, जिससे बिच्छू पुन: पानी में जा गिरा। महात्मा ने फिर से बिच्छू को बाहर निकालने के लिए जैसे ही हाथ से उठाया, उसने फिर से डंक मार दिया। दर्द के कारण महात्मा ने हाथ झटका और ऐसा करते ही बिच्छू फिर से पानी में जा गिरा। यह क्रिया-प्रतिक्रिया कई बार दोहराई गई, नतीजा एक जैसा। न महात्मा ने अपना प्रयास छोड़ा, न बिच्छू ने उन्हें डंक मारना छोड़ा। सहकारिता के शीशमहल के एक पूर्ववर्ती ज्ञानीजी जैसा कोई सज्जन इस दृश्य को देख रहा था, जब उससे रहा न गया तो, उससे महात्मा से कहा – महाराज, आप इस बिच्छू को बचाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन ये बार-बार आपको डंक मार रहा है, आप उसे उसके हाल पर छोड़ क्यों नहीं देते। महात्मा ने उत्तर दिया – जब वो अपनी बुरी आदत नहीं छोड़ रहा, तो मैं अपनी अच्छी आदत कैसे छोड़ दूं।
कहानी का लब्बो-लुआब यह है कि शीशमहल में बिराजे अपने ठाकुर जी ने झालाना का जंगल भले ही छोड़ दिया हो, लेकिन महात्मा जी की भांति अपनी अच्छी आदतें नहीं छोड़ी। राजस्थान में तो श्रीकृष्ण जी को ठाकुर कहा जाता है। उन ठाकुर की भांति, अपने ठाकुर साहब भी कृपानिधान हैं। झालाना के जंगलों में स्थाई रोजगार दिया करते थे, तो पात्र-कुपात्र का भेद भी नहीं रखते थे। जब से शीशमहल में आए हैं, यहां भी पात्र-कुपात्र का भेद किए बिना, रोजगार की झड़ी लगा रखी है, हालांकि, इस रोजगार उत्सव में, झालाना के जंगलों में स्थित सहकारी महकमे से दिए जाने वाले रोजगार की भांति स्थाई नहीं है, लेकिन भूखे को बासी रोटी भी मिल जाए, तो वह दुआएं ही देता है। शीशमहल में दरबार लगाने वालों को दुआएं और बड़े लोगों की सेवाएं ही बचा कर रख सकती हैं। वरना, बड़ी पोजिशन और बड़ा रुतबा रखने वाले लोचन जैसे जीव यहां से मात्र चंद सप्ताह में ही बेआबरू होकर लौट गए।
इसलिए, दुआएं एकत्र करने के लिए ठाकुर जी ने शीश महल में रोजगार उत्सव आयोजित कर रखा है। उनकी कृपा और झालाना के जंगलों वाले ज्ञानीजी के महकमे के आशीर्वाद से अल्प समय में ही 30-40 बेरोजगार अस्थाई रोजगार पा चुके हैं। हालांकि, उत्सव अभी समाप्त नहीं हुआ है। भारी भरकम स्टाफ वाले शीशमहल में अस्थाई रोजगार देने का कोई तुक या वाजिब कारण तो समझ में नहीं आ रहा लेकिन इस बेतुके और अनावश्यक वित्तीय भार वाले निर्णय को मीडिया की नजरों से बचाए रखने के लिए ठाकुर साहब ने मीडिया मैनेजमेंट बहुत अच्छे से कर रखा है।
यह तो जगजाहिर है कि ठाकुर साहब पर सिविल लाइन वालों की अपार कृपा है, इसलिए वैसे तो वे मीडिया को कुछ नहीं समझते, लेकिन सिविल लाइन वालों की चाकरी करने वाले मीडिया को पूरी तवज्जो देते हैं। इसलिए बेरोजगारों को रोजगार देने के इस अभियान में सिविल लाइन वालों की झूठी जय-जयकार करने वाले मीडिया वाले भी ऑब्लाइज हुए हैं। एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वालों की तो ‘पार्ट टाइम जीवनसंगिनी’ भी इस अभियान में रोजगार पा गई है। इसका एक फायदा ये हुआ कि मीडिया से आजकल सहकारिता के शीशमहल की नकारात्मक खबरें गायब हो चुकी हैं। ‘सहकारिता में सहकार’ का ऐसा अनूठा संगम शायद ही कहीं देखने को मिले, जिसमें मीडिया भी प्रफुल्लित हो रहा हो। इससे एक बात तो तय हो गई कि शीश महल वाली कुर्सी का अलग ही जलवा है। इसपर बैठते ही अफसर आत्मज्ञानी हो जाता है और अपने आत्मज्ञान के बल पर वह सिविल लाइन से लेकर शासन सचिवालय तक, सबको साध लेता है।
आत्मज्ञानी से सहकारिता के ‘ज्ञानी जी’ याद आ गए। शीशमहल से जुड़े ऐसे एक और अनोखे ताजा किस्से में कल ज्ञानीजी की भी चर्चा करेंगे, तब तक के लिए जय सहकार।
((प्रस्तुत इमोजी सोशल मीडिया से साभार)

