कहि-सुनी : टिक्काकरण की नहीं, टीकाकरण की जरूरत
कहि-सुनी : उज्जैन के राजा विक्रमादित्य को उनकी अद्वितीय न्यायप्रियता, अदम्य साहस और ज्ञान-विज्ञान के संरक्षण के लिए भारत के महान राजाओं में गिना जाता है। इसका सबसे बड़ा श्रेय उनके दरबार के ‘नौ रत्न’ को भी जाता है, जो राजा को सदैव सही परामर्श दिया करते थे। इनमें महान संस्कृत कवि और नाटककार कालिदास, आयुर्वेद के प्रसिद्ध विशेषज्ञ वैद्य धन्वंतरी, खगोलशास्त्री और ज्योतिष के प्रकांड विद्वान वराहमिहिर, सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं ‘अमरकोष’ के रचयिता अमरसिंह, व्याकरण के विशेषज्ञ प्रसिद्ध कवि वररुचि, ज्योतिष और नीतिशास्त्र के जानकार क्षपणक, शिल्पकार/वास्तुकार शंकु, नीतिशास्त्र के जानकार व राजा के सुरक्षा प्रमुख वेतालभट्ट और संस्कृत के प्रकांड विद्वान घटखर्पर शामिल थे।
विक्रमादित्य का उदाहरण यह बताने के लिए दिया गया कि राजा को महान बनाने में उनके दरबारियों का बड़ा योगदान होता है। आज के दौर में ब्यूराक्रेट्स भी राजा ही हैं। राजा को महान बनना है तो सम्राट विक्रमादित्य जैसे नौ रत्न तलाशने होंगे। चूंकि कलयुग में नौ रत्न मिलना प्राय:-प्राय: असंभव है, इसलिए भगवान श्रीकृष्ण जैसे एक-दो सलाहकार ही पर्याप्त हैं। कृष्ण जैसा सलाहकार सारथी हो तो महाभारत विजय सरल हो जाती है, यदि एक भी सलाहकार शकुनि जैसे दुष्ट मानसिकता वाला हो तो…….!
सहकारी आंदोलन में डाक्टर साहब की डोज का इतना तो असर हुआ है कि सहकारजनों को सीट पर बैठने की आदत हो गयी है। कुछ अफसर मलाईदार पदों को छोडक़र, डम्प पोस्टों पर इसलिए गये थे कि परिवार के साथ सूखी तनख्वाह रूपी बताशों पर गुजारा कर लेंगे, लेकिन डाक्टर ने ड्यूटी टाइम का ऐसा डोज दिया है कि अब अपनी मूल सीट पर बैठकर मोबाइल पर आंखे टिमटिमाने से ही हाजिरी लगेगी। ऐसे लोगों का हनीमून पीरियड अब खत्म होने को है। हाजिरी वाले डोज का असर यह हुआ है कि महीने में 15 दिन फरलो पर रहने वाले मूल सीट पर पिछवाड़ा टिकाना सीखने लगे हैं। जब सीटों पर बैठने लगे हैं तो भविष्य में काम करना भी सीख लेंगे।
सारा महकमा डॉक्टर साहब के लंबे-लंबे प्रिस्क्रिप्शन से बड़ा प्रभावित है, लेकिन मलाल ये है कि डाक्टर साहब के पास, विक्रमादित्य की भांति नवरत्न सलाहकारों का नितांत अभाव है। यानी वे जिस मूवमेंट की सेहत सुधारने आये हैं, उसके लिए कालीदास, धन्वंतरी और वराहमिहिर जैसे दक्ष सलाहकारों की जरूरत है, जो कि डॉक्टर साहब के सचिवालय वाले क्निलिक में अब तक तो नजर नहीं आये। जो नजर आये हैं, वे सब माशाअल्लाह हैं। पांच सलाहकारों में से चार, फील्ड के नाम पर सफाचट्ट हैं, एक महाज्ञानी के पास फील्ड का ज्ञान तो बहुत है, लेकिन वे जहां-जहां भी रहे, वहां-वहां बंटाधार ही करके आये। ज्ञानीजी के पास ज्ञान बघेरने के लिए किस्से-कहानियां तो बहुत हैं, लेकिन सरकार ने आज तक उन्हें जिस नर्सिंग होम में लगाया है, वे वहां पर मरीजों का रोग बढ़ाकर ही आये हैं। डॉक्टर साहब चाहें तो कुछ सूझवान अफसरों से फीड बैक ले सकते हैं या जहां-जहां वे रहे, वहीं के लोग बता देंगेे कि महाज्ञानी जी के पास कितना ज्ञान का भंडार है।
ओशो कहते हैं – जिनके पास जो होगा, वही तो देगा। जिसके हृदय में प्रेम है, वो प्रेम बांटेगा, जिसके हृदय में घृणा है, वो घृणा बांटेगा।
मेले में सांस्कृतिक संध्या वाले दिन डॉक्टर से स्टेंड पर मोबाइल सैट करने की घटना के दौरान अफसरों को यह तो साफ-साफ संदेश दे दिया कि उनके लिए किसी को सीधा करना दो मिनट की बात है। परन्तु, जिस मूवमेंट में डॉक्टर साहब अब आये हैं, वहां के लोगों, विशेषकर निचले पायदान वालों को सीधा करने के लिए टीकाकरण (वेक्सीनेशन) की सख्त जरूरत है, हालांकि फिलहाल डॉक्टर साहब के नर्सिंग होम में सारे सलाहकार, टिक्काकरण (तिलक लगाने वाले) ही हैं। पूजा-पाठ के माध्यम से दुआएं तभी काम करती हैं, जब मर्ज को पहचान कर, सही दवा दी जाये। इसलिए हमारा तो यही मानना है कि इस मूवमेंट में भी अपने नाम और प्रतिष्ठा के अनुरूप प्रदर्शन करना है तो सुयोग्य और दक्ष सलाहकारों की भर्ती करनी होगी।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक ‘भारत दुर्दशा’ में ‘सत्यानाश’ नाम के एक पात्र ने गलत नीतियों और अंधविश्वास से होने वाली बर्बादी को दर्शाते हुए कहा था – ‘जहँ जहँ पैर पड़े संतन के, तहँ तहँ बंटाधार’। ऐसे बंटाधार करने वाले संतों की मौजूदगी में हम डॉक्टर साहब के लिए सिर्फ दुआ ही कर सकते हैं, उपचार को उन्हें स्वयं ही करना होगा। जय सहकार।
((प्रस्तुत इमोजी सोशल मीडिया से साभार)

