कही-सुनि : मक्खन का थोक व्यापारी
मार्केट में जब भी कोई बड़ा दिग्गज आता है, तो छोटे व्यापारी अपने कारोबार को लेकर विभिन्न आशंकाओं से त्रस्त हो जाते हैं। बड़ा व्यापारी साधन-सुविधा सम्पन्न होता है। बड़े-बड़े ऑफर देकर ग्राहकों को अपनी ओर खिंचने में समर्थ होता है, इसलिए छोटों का डर स्वाभाविक है। मक्खन का एक थोक व्यापारी, चंबल के रास्ते होते हुए जब से सहकारिता के कमांड सेंटर में आया है, तब से कटोरीनुमा मक्खन वाले छोटे व्यापारियों की जान आफत में है। उनकी स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसे छोटे ग्रॉसरी स्टोर के सामने डी-मार्ट खोल दिया जाए। यह अफसर चंबल के सहकारी शीशमहल को डाकू की भांति लूटने के बाद, अब पूरे प्रदेश में अपने पैर पसारने को आतुर है। जहां से सहकारी सेवा की शुरूआत की, वहां के अफसरों को धमकाने का सिलसिला तो शुरू कर ही चुका है। जहां-जहां बैचमेट हैं, वहां भी कारोबारी ने सब-ब्रांचेज खोलनी शुरू कर दी हैं। आखिर, पूरे राजस्थान का शॉर्ट टर्म हेंडल कर रहे हैं। पहले भी ऐसा हुआ है, जब तीसरी मंजिल पर बैठे सहकारिता के ब्रह्म, विष्णु, महेश को कानों-कान खबर नहीं होती थी, और दूसरी मंजिल वाले इसी सेक्शन से बड़े -बड़े मामले निबटा दिए जाते थे। अब वाले ब्रह्मा, विष्णु, महेश तो वैसे भी तीसरी मंजिल पर नहीं बैठते। उनके पास तो वैसे भी आाधी-अधूरी खबरें ही पहुंचती हैं। ऐसे में ये दूसरी मंजिल वाले क्या-क्या गुल खिला रहे होंगे, भगवान ही जानें।
आमतौर पर अफसरों की आदत होती है कि वे आरसीएस और पीएससी को थोड़ा बहुत मक्खन लगा कर, उनकी छत्रछाया में अच्छा समय व्यतीत कर लेते हैं, लेकिन चंबल का यह डाकू पहले दिन से अपने साथ 220 लीटर के मक्खन और चापलूसी के ड्रम रखता है। बोलता है तो शब्द यूं झरते हैं मानो शहद के झरने बह रहे हों।हुकुम…हुकुम करते हुए किसी के भी अंदर तक बैठ जाने वाले कलाकार ने कमांड सेंटर की प्रभावशाली कुर्सी पर बैठते ही अधीनस्थ जिला अफसरों को धमकाना शुरू कर दिया है। अपना नेटवर्क खड़ा करने में एमएलएम (मल्टी लेवल मार्केटिंग) लीडर्स को पीछे छोड़ देने वाला यह घाघ अफसर, पैक्स से लेकर अपैक्स तक के कारिंदों से सीधे संपर्क में रहता है, इसलिए सहकारिता की सबसे छोटी इकाई वालों की आईडी चालू करने के लिए अफसरों को धमकाने से भी बाज नहीं आ रहा।
सुबह घर से निकलते हुए मक्खन और चापलूसी का एक-एक ड्रम साथ लेकर चलता है, और जब भी मौका मिलता है, डॉक्टर साहब हों या सिविल लाइन वाले मुखिया जी, अपने शब्दजाल से दिन में एक-दो बार तो डूबकी लगवा ही देता है। जो एक बार इनके ड्रम में डूबकी लगा लेता है, उसका तन-मन-व्यक्तित्व चापलूसी की चिकनाई से तर-बतर हो जाता है, ऐसे व्यक्ति को फिर अन्य अफसरों की चम्मल भर चापलूसी अच्छी नहीं लगती। अब देखना ये है कि कमांड सेंटर में कार्यरत कटोरी भर मक्खन वाले अफसर, ड्रम वाले अफसर का मुकाबला कैसे करते हैं।
समस्या तो उनके लिए भी है, जो कर्म को पूजा मानते हैं, और जिनके लिए कटोरी भर मक्खन साथ में रखने का मतलब, चुल्लू भर पानी में डूब मरने जैसा है। गैरतबंद से तो झूठी हां में हां भी नहीं मिलायी जाती, बेगैरत का क्या है, तलवे से लेकर पिछवाड़ा तक, कुछ भी चटवा लो। चापलूस के लिए दो तौले की जुबान को गज भर करने में समय ही कितना लगता है। यदि चंबल के डाकू जैसा अव्वल दर्जे का चापलूस हो, तो जुबान मील भर लंबी और भ्रम का वातावरण बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता जैसा हो सकता है।
समय ही ऐसा है। ईमानदार और कर्मठ व्यक्ति के सच्चे बोल चुभ जाते हैं, लेकिन चरण-चाकर के मन की कलुषता किसी को दिखाई नहीं देती। इस चापलूस अफसर का अब तक का अतीत इतना दागदार है कि कोई समझदार मुखिया होता तो इसे सीधे चंबल में फेंक देता, लेकिन अपने मुखिया जी भी चंद्रकांता उपन्यास के किरदार से कम ऐयार थोड़े ना हैं। चंबल में फेंकने लायक सामान को सहकारिता के माथे के मुकुट का मणि बनाकर सहकारिता के कमांड सेंटर में ले आए। मुखिया जी के अपने सपने हैं। उन्हें ऐसे अफसरों की तलाश रहती है जो आलू से सोना बनाने की काबलियत रखते हैं। इधर फाइल रूपी आलू डालो, उधर से सोना निकालो।
आपको एक किस्सा सुनाते हैं।
आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने पाश्र्व गायक किशोर कुमार को मुम्बई (बम्बई) में आयोजित कांग्रेस की रैली में गाने के लिए आमंत्रित किया, लेकिन किशोर-दा ने इस आमंत्रण को ठुकरा दिया। इससे नाराज होकर तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल के निर्देश पर किशोर-दा के गानों के प्रसारण पर रोक लगा दी गई थी, जो आपातकाल की समाप्ति तक जारी रही। इसके बाद इंदिरा गांधी की विदाई हुई और किशोर कुमार के गाने फिर से आकाशवाणी पर बजने लगे। किशोर दा ने तब कहा था, तुम लोग आते जाते रहोगे, हम स्थाई हैं। ये जो आज प्रधान कार्यालय में पावर वाले पद की बदौलत उछल कूद मचा रहे हैं, ये भी आते-जाते रहेंगे, उनके जेसे पहले भी कई आये और चले गये, स्थाई तो हम हैं। एक बार पहले भी, उनके एक साथी ने किलक राज में खूब धमाल मचाया था, वो तो घर चले गये और उनकी आज की हालत किसी ने छुपी नहीं है। आखिर दोनों एक ही शहर के जो ठहरे। कहते हैं कि गोरे के साथ काला रहे, तो रंग का असर तो नहीं आता, लेकिन संगति का असर जरूर आ जाता है। इसके काले कारनामे जल्द ही हम सार्वजनिक करेंगे।

