मुखपत्र

कही-सुनि : त्रिकालदर्शी

प्रतिभा किसी देश, काल, परिस्थिति, अर्थव्यवस्था की मोहताज नहीं होती। प्रतिभा उम्र की मोहताज भी नहीं होती। बिग-बी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। कभी फेल होकर, करोड़ों के कर्जदार हो गए थे, लेकिन अपनी प्रतिभा के दम पर वे अब 83 साल के होकर भी हर माह करोड़ों रुपए कमाते हैं। कुछ लोगों में हिडन टेलेंट होता है, जो अनुकूल परिस्थिति में ही उभर कर आता है। सहकारिता का शीशमहल भी एक ऐसी ही शानदार जगह हैं, जहां सहकारी अधिकारियों का हिडन टेलेंट प्रकट होता है। ज्ञानीजी के बाद अब ठाकर साहब का त्रिकालदर्शी टेलेंट सबके सामने आया है।

पहले तो ये जानते हैं कि त्रिकालदर्शी कौन होता है? वह व्यक्ति जिसे तीनों काल यानी भूतकाल, वर्तमान और भविष्य काल का संपूर्ण और स्पष्ट ज्ञान होता है। यह शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना है- त्रि (तीन)+ काल (समय)+ दर्शी (देखने वाला), अर्थात जो समय की सीमाओं से परे जाकर सब कुछ स्पष्ट देख सकता है। त्रिकालदर्शी को पिछले समय की घटनाओं, आज की स्थिति और आने वाले कल में होने वाली हर बात का पहले से पता होता है। यह किसी भी परिस्थिति या काल से बंधे नहीं होते, बल्कि साक्षी या दृष्टा बनकर सब कुछ देखते हैं। यह साधारण आंखों से नहीं बल्कि योग, साधना या दिव्य दृष्टि के बल पर ब्रह्मांडीय सत्यों को समझते हैं।

हिंदू पौराणिक कथाओं और ग्रंथों के अनुसार, सभी देवी-देवता त्रिकालदर्शी माने जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मनुष्यों में महाभारत काल में पांडव पुत्र सहदेव को त्रिकालदर्शी माना गया है, जिन्हें भविष्य में होने वाली महाभारत की हर घटना का पूर्व ज्ञान था। मनुष्यों की बात करें तो महाभारत काल के बाद, कलयुग में सहकारी महकमे को सहकारिता के शीशमहल में ठाकर साहब के रूप में त्रिकालदर्शी मिले हैं, जिन्हें तीनों काल में होने वाली घटनाओं का बाखूबी ज्ञान रहता है। भूतकाल में वे झालाना के जंगलों में रहते हुए सिविल लाइन वाले मुखिया को साधने में सफल रहे, वर्तमान में डॉक्टर साहब को पूरी शिद्दत से साध रहे हैं और शीशमहल के बेताज बादशाह होने के भ्रम में वे फिलहाल जो कर्म कर रहे हैं, उनके लिए उन्होंने खाकी वालों और काले कोट वालों को साधने का इंतजाम भी कर लिया है।

किस्सा ये है कि बड़े ठाकुर के पास, झीलों वाली नगरी से एक छोटे ठाकर की दिव्यदृष्टि का प्रकरण आया तो सफेद कोट वालों की मदद ली गई। सफेद कोट वालों ने दिव्यदृष्टि को कम आंका तो आनन-फानन में, छोटे ठाकर साहब को घर भेज दिया और प्रकरण को खाकी वालों के पास रैफर कर दिया। राजीवगांधी सहकार भवन वाले संभागीय मुख्यालय की न्याय की अदालत ने छोटे ठाकर की दिव्यदृष्टि पर निर्देश दिया तो छोटे ठाकर नयी दिव्यदृष्टि का सर्टिफिकेट ले आए। अब छोटे ठाकुर के पास दिव्यदृष्टि के तीन सर्टिफिकेट थे। एक जब वो शीशमहल की सर्विस में आए, दूसरा जब शीशमहल वालों ने दिव्यदृष्टि की जांच करवाई और तीसरा, जब वे न्याय की अदालत के निर्देश पर नया सर्टिफिकेट ले आए। नए सर्टिफिकेट में उनकी दिव्यदृष्टि, उस सर्टिफिकेट से भी अधिक पावरफुल अंकित थी, जिस सर्टिफिकेट के आधार पर वे सर्विस में आए, जबकि शीशमहल वालों के पास जो दूसरा सर्टिफिकेट था, उसमें अंकित दिव्यदृष्टि में और छोटे ठाकर साहब द्वारा प्रस्तुत तीसरे सर्टिफिकेट में अंकित दिव्यदृष्टि में दोगुने का अंतर था।

इस मामले में बड़े ठाकर साहब को काले कोट वालों से सलाह – मशविरा करके आगे बढऩा था, लेकिन नहीं किया। दिव्यदृष्टि के मामले में सहकारिता के ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रेमपत्रों का वाचन कर, उन्हें चरितार्थ करना था, नहीं किया। खाकी वालों के पास पेंडिंग केस पर दिमाग लड़ाना था, नहीं लड़ाया। न्याय की ऊंची अदालत के दरवाजे पर दस्तक देनी थी, नहीं दी।

बड़े ठाकर साहब त्रिकालदर्शी थे, सो उन्होंने अपना और छोटे ठाकर का भूत-वर्तमान-भविष्य भांपते हुए, छोटे ठाकर साहब के अधिकतम पक्ष वाले दिव्यदृष्टि सर्टिफिकेट को सही मान लिया और घर से वापिस बुलाकर न केवल फिर से पद और प्रतिष्ठा बहाल की, बल्कि झीलों वाली नगरी से लाकर शीशमहल में विराजमान कर दिया। बड़े ठाकर को पता था कि जिस प्रकार नियम-कानून को खूंटी पर टांगकर, जिस पैटर्न और जल्दबाजी से बहाली का फरमान सुनाया गया, भविष्य में कानूनी पचड़ा तो पड़ेगा, इसलिए छोटे ठाकर साहब को ऐसी सीट पर बिठा दिया, जिससे वो अपने खिलाफ या यूं कहें कि अपने पक्ष में खुद ही पैरवी कर सकें।

बताते हैं कि पचड़ा तो पड़ गया है। बैंक के सलाहकार काले कोट वालों ने इसे त्रिकालदर्शी ठाकर के लिए सुसाइडल अटेम्ट बताया है। बड़ा सवाल, इतनी जल्दी क्यों की? न्याय के बड़े मंदिर में क्यों नहीं गए? खाकी वालों के पास पेंडिंग केस के निपटने का इंतजार क्यों नहीं किया? ऐसे मामलों में रजिस्ट्रार द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया? हम किसलिए हैं, हमसे सलाह क्यों नहीं की? आदि-इत्यादि, अनेक सवाल हैं लेकिन कलयुग में बाप-बड़ा ना भईया, सबसे बड़ा……..।

ठाकर साहब जब झालाना के जंगलों में पोस्टेड थे, तब भी ऐसा ही प्रकरण सामने आया था, लेकिन सिविल लाइन वाले मुखिया जी पाक-साफ बचा कर शीशमहल में ले आए। इसलिए भूतकाल का ज्ञान है। शीशमहल में नई दुकान खुलवाकर मुखिया जी के चेलों-चपटों को सैट कर दिया, इसलिए वर्तमान सुरक्षित हो गया। भविष्य पर कुछ बात अटकी है। हालांकि, त्रिकालदर्शी हैं, इसलिए भविष्य भी देख ही रखा होगा। यदि मुखिया जी के भरोसे भविष्य को सुरक्षित मान रहे हैं, तो अपने निलम्बित सहयोगियों की सूची देख लें। इन्हें भी कभी मुखिया जी पर बड़ा भरोसा था।

इसी क्रम में मुझे एक किस्सा याद आ गया, जो ओशो ने एक कार्यक्रम में सुनाया था। ओशो कहते हैं कि मेरे पास एक व्यक्ति आया, जो स्वयं को त्रिकालदर्शी बताता था। वह दावा करता था कि उसे भूत, वर्तमान और भविष्य की घटनाओं की जानकारी रहती है। उसने मुझे बताया कि आज से दस बरस बाद फलां आदमी का कत्ल होगा, फलां आदमी कातिल होगा और उसे फांसी की सजा होगी। यह बताकर वह चला गया। दो दिन बाद, उसे त्रिकालदर्शी के घर में चोरी हो गई। दो लाख के गहने व नगदी चोरी हो गई। कमबख्त, दो दिन बाद का तो देख न पाया, दस बरस बाद की बता कर चला गया।

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