ये रिश्ता क्या कहलाता है…..
गालिब ने कहा था, दुनिया में बेवकूफों की कमी नहीं गालिब, एक ढूंढो हजार मिलते हैं। लेकिन सहकारिता की दुनिया ही अलग है। सहकारिता के संदर्भ में बात करें तो हम कह सकते हैं कि सहकारिता में फनकारों की कमी नहीं गालिब, एक ढूंढों, हजार मिलते हैं। गुलाबी नगर में ही बाइस गोदाम सर्किल से लेकर नेहरू बालोद्यान तक, बनी पार्क से लेकर झालाना के जंगलों और सिविल लाइंस तक, हर जगह फनकार भरे हुए हैं। सबमें अलग-अलग फन (कला) छुपा हुआ है।
इन दिनों सहकारिता के शीशमहल के एक फनकार की चर्चा जोरों पर हैं। मुखिया जी ने सरेआम इस फनकार को कभी चोर और डाकू बताया। किसानों का दुश्मन बताया। इसके चरित्र को संदिग्ध बताते हुए किसानों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की कमेटी से बाहर रखने की घोषणा की। एक समय तक मुखिया जी ने फनकार को बर्खास्त किये जाने तक की हद तक गुस्से का नाटक करते दिखे। फनकार को लम्बे समय तक आधी तनख्वाह पर घर भेजे जाने के दावे किये गये, लेकिन वे को कुछ दिन में पूरे वेतन पर ड्यूटी पर लौट आये। बताते हैं तब मुखिया जी ने महीने भर के लिए आयी एक अस्थयी मैडम तक संदेश भिजवाया था, जिसके बाद तत्कालिन ज्ञानी जी ने अपने स्तर पर ही फनकार को बहाल कर दिया था, हालांकि, खुर्राट मैडम जब नीतीश प्रदेश से लौट कर आयी, तब इस मैटर को लकर कई दिन तक ज्ञानी जी के हलक से पानी नीचे नहीं उतरने दिया था।
खैर, हम यहां पर मुखिया जी और फनहार जी के खट्टे-मीठे रिश्ते को आगे बढाते हैं। ये रिश्ता, टीवी के एक डेली सोप ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’, जैसा है। सालों-साल यह धारावाहिक देखने के बावजूद, दर्शन यह अंदाजा नहीं लगा पाते कि कौन रिश्तेदार किसके साथ है। नायरा और कार्तिक गोयनका की इस कहानी में समय-समय पर परिस्थितियां इतनी उलझ जाती हैं कि कौन रिश्तेदार मित्र है औरकौन शत्रु, कुछ समझ नहीं आता। हमारी सहकारिता के कई किस्से कहानियों की भांति मुखिया जी और फनकार का रिश्ता भी नायरा और कार्तिक के रिश्ते जैसा ही है।
एक बहुत बड़ी लापरवाही के दोषी फनकार को घर भेजने के साथ ही अनुशासन का पाठ पढाने के लिए षोडष दस्तावेज दिया गया। जीरो टॉलरेंस पर मुखिया जी ने खूब वाह-वाही बटोरी। फिर, आश्चर्यजनक रूप से अल्पावधि में ही, शोडष दस्तावेज को पेंडिंग रखते हुए, फनकार को ससम्मान अपने पद पर बहाल कर शीशमहल में बुला लिया गया। इस दौरान समकक्ष दूसरे फनकार और निवर्तमान ज्ञानी जी के परम प्रिय सखा को ‘बिना काम, पूरा वेतन’ फार्मूले पर घर भेज दिया गया, तो फनकार को दूसरे बड़े पद की जिम्मेदारी भी दे दी गयी। कहां तो बर्खास्तगी और कहां शीशमहल के दूसरे स्तर के दो बड़े पदों की एक साथ जिम्मेदारी।
इससे भी बड़ी हैरानी ये कि जिस फनकार को चार महीने पहले तक मुखिया जी ने किसानों का, मानवता का, सहकारिता का शत्रु बताया था और जिसके लिये अपने निवास-कार्यालय के द्वार बंद कर दिये थे, उसी फनकार को पुन: उसी कमेटी का प्रभावशाली सदस्य बना दिया है। इसी प्रभावशाली पद का दुरूपयोग करते हुए किसानों को 54 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंंचाने का मुख्य आरोपी बताते हुए फनकार को आधे वेतन पर घर भेजा गया था। अब वही घोड़े हैं, वही मैदान हैं। महफिल फिर सज गयी है। प्रवेश पर प्रतिबंध वापिस ले लिया गया है। उसी फनकार से सारा ज्ञान लिया जा रहा है। मुखिया जी को पता है कि फनकार दबाव में है। जब तक शोडष दस्तावेज का निपटारा नहीं होगा, फनकार से जैसा चाहेंगेे, जिस ढंग से चाहेंगे, वैसा काम लेंगे।
मुखिया जी को इस बात का बड़ा मलाल है कि मामूली सिपाही होने के बावजूद फनकार ने पिछली बार मुखिया जी के हिस्से में से कुछ मक्खन छाछ में छिपा कर रख लिया था। होशियार मुखिया जी, इस बार अपने हिस्से का पूरा मक्खन सुरक्षित रखने के साथ-साथ फनकार को भी दोष मुक्त किये जाने का रास्ता बनाने में जुट गये हैं। फनकार को पुन: उसी कमेटी का प्रभावशाली सदस्य बनाये का मतलब ही उसके पिछले गुनाह को कम करना है। इसी से अनुशासनात्मक कार्यवाही में दोषमुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा।
मुखिया जी को भली-भांति समझने वाले सहकारजन फनकार को ही कमेटी में शामिल किये जाने का एक और पुख्ता कारण भी बताते हैं। वो ये ही यदि फनकार की जगह किसी नये सदस्य को जिम्मेदारी दी जायेगी, तो उसे सारा खेल समझाना पड़ेगा। यानी नये मेम्बर को दिखाना पड़ेगा कि हमाम में कौन-कौन कितना वस्त्रहीन खड़ा है।
इस गोल-गोल खेल को कपिल शर्मा शो में कीकू शारदा ने दामोदर जेठमलानी के किरदार में खूबसूरत ढंग से समझाया था। किस्सा बाग से फल तोडऩे के दौरान माली द्वारा डंडा मारा जाने से प्रेरित था। कीकू ने बताया कि इस दुनिया में सब कुछ सीधा-सीधा नहीं है। सब एक सर्किल (गोलचक्र) है। कीकू बताते हैं – कल मैं बगीचे में गया। मैंने दूर से एक पेड़ पर फल देखा। फल को देखा मेरी आंखों ने, लेकिन लालच जागा मेरे मन में। अब मन तो पेड़ की ओर जा नहीं सकता, इसलिए वहां पर मुझे मेरे पैर लेकर गये। पैर फल तोड़ नहीं सकते, तो फल तोड़ा हाथों ने। हाथ फल को खा नहीं सकते, तो खाया मेरे मुंह ने। मुंह फल को रख नहीं सकता, इसलिए खाने के बाद फल को रखा मेरे पेट ने। ये सब होते हुए देखा माली ने। माली को गुस्सा आया तो उसने मेरे पीठ पर मारा डंडा। डंडे की चोट से दर्द हुआ तो आंसू आये आंख में क्योंकि सबसे पहले आंख ने ही फल को देखा था। (https://youtu.be/ERJA9EclU28?si=v50sEaMtNvElHUw3 )
अर्थात सहकार में सीधा-सीधा कुछ नहीं है। सब सर्किल है। गोल-गोल है। सहकारिता के कमांड सेंटर के भूखंड का आकार भले ही आयताकार है, लेकिन सर्किल पर स्थित होने के कारण, कुछ गोल-गोल भीतर तक आ ही जाता है। इस गोल-गोल में बहुत कुछ गोलमाल है। मुझे नहीं लगता कि ये गोल-माल क्या है, किसी को पता नहीं हो। इति! ((प्रस्तुत इमोजी सोशल मीडिया से साभार)

