राजस्थान सहकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति की सहकारिता मंत्री गौतम दक को दो टूक चेतावनी, मांगे नहीं मानी तो पैक्स कार्मिक अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाएंगे
AI Image
जयपुर, 24 सितंबर (मुखपत्र)। राजस्थान के ग्राम सेवा सहकारी समिति कर्मचारियों ने अंतत: भजनलाल शर्मा सरकार के साथ आरपार की लड़ाई का मानस बना ही लिया। राजस्थान सहकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने सहकारिता राज्यमंत्री गौतम दक को प्रेषित अंतिम परिवेदना में सहकारिता विभाग पर तीन दशक से अकर्मण्य कार्यशैली, समझौतों से मुकरने की प्रवृत्ति का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी है कि यदि 15 अक्टूबर 2026 तक पैक्स-लैम्पस कार्मिकों की चिर-लंबित मांगों का समाधान नहीं हुआ तो गांव-गुवाड़ में विस्तारित सहकारी आंदोलन के सिपाही अनिश्चतकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे।
ज्ञापन पर हनुमान सिंह राजावत (संयोजक एवं प्रदेशाध्यक्ष, राज. बहुउद्देशीय सहकारी सो. कर्मचारी यूनियन), मदन मेनारिया (संयोजक एवं प्रदेशाध्यक्ष, राज. सहकारी कर्मचारी विकास मंच) और कुलदीप जंगम (संयोजक एवं प्रदेशाध्यक्ष, राज. सहकारी कर्मचारी संघ-भामस) के हस्ताक्षर हैं। भामस (भारतीय मजदूर संघ), राजस्थान में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का आनुशांगिक संगठन है।
क्या कहा गया है ज्ञापन में
सहकारी आंदोलन किसी भी राष्ट्र की आर्थिक रीढ़ और ग्राम्य आंचल की जीवनरेखा होता है। इस त्रिस्तरीय संरचना के अंतिम किंतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण छोर पर खड़ी ग्राम सेवा सहकारी समितियों (पैक्स/लैम्पस) के व्यवस्थापक एवं कार्मिक निरंतर उपेक्षा, आर्थिक संत्रास और प्रशासनिक संवेदनहीनता के भंवर में जीने को विवश हैं। सहकारिता विभाग के इतिहास पर यदि निष्पक्ष दृष्टि डाली जाए, तो यह अत्यंत पीड़ादायक सत्य उजागर होता है कि विभागीय स्तर की विगत तीन दशकों से चली आ रही कार्यशैली केवल कोरे कागजी आश्वासन, अव्यावहारिक शब्दाडंबर और उच्च स्तरीय वार्ताओं में हुए संगठनात्मक समझौतों से बार-बार मुकर जाने की ही रही है। सहकार के नाम पर कार्मिकों के भाग्य के साथ यह अनवरत छलावा अब अपने चरम पर पहुंच चुका है।
कार्यात्मक विरोधाभास और पचास प्रतिशत रिक्त पद
यह सर्वविदित है कि प्रदेश की पचास प्रतिशत से अधिक पैक्स-लैम्पस संस्थाएं आज भी व्यवस्थापक जैसे महत्वपूर्ण पदों के बिना रीढ़हीन स्थिति में संचालित हो रही हैं। एक ओर सीमित संस्थागत स्थायित्व और शून्य आर्थिक सक्षमता के बीच इन संस्थानों पर जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (डीसीसीबी) के ऋण पर्यवेक्षक के जटिल दायित्वों का बोझ लाद दिया गया है, वहीं दूसरी ओर फसली ऋणों के वितरण, पैक्स कंप्यूटराइजेशन तथा अन्य तमाम महत्वाकांक्षी विभागीय योजनाओं का सफल निष्पादन दिन-रात बिना वेतन के करवाया जा रहा है।
राष्ट्रीय गौरव और मैदानी अभिशाप
यह कैसी विडंबना है कि सहकारिता मंत्रालय के पांच वर्ष पूर्ण होने पर दिल्ली में आयोजित देशव्यापी समारोह में राजस्थान प्रदेश को ‘सहकारिता की नवीन पहलों को धरातल पर उतारने का प्रथम राष्ट्रीय गौरव प्राप्त होता है, जिसका पूरा श्रेय मैदानी मोर्चे पर पसीना बहाने वाले पैक्स-लैम्पस कर्मियों की रणनीतिक कार्यशैली को जाता है, किंतु इसके विपरीत, उन्हीं कर्मठ प्रहरियों को महीनों तक आर्थिक संत्रास और वेतनविहीन जीवन जीने के लिए विवश किया जाता है।
अव्यावहारिक कार्यशैली और समझौतों से मुक्ति का इतिहास
विभागीय तंत्र की पिछले तीस वर्ष से यही परिपाटी रही है कि बैठकों में लिखित अथवा मौखिक सहमति देने के पश्चात भी नौकरशाही स्तर पर फाइलें उलझा दी जाती हैं। गत 6 अक्टूबर 2025 को हुई उच्च स्तरीय वार्ताओं में कैडर अथॉरिटी के गठन, नियमितीकरण (स्क्रीनिंग), बैंकिंग सहायक भर्ती, बैंक ऋण पर्यवेक्षक पद पर चयन और नाबार्ड की नवीन एच.आर. पॉलिसी जैसे जिन बिंदुओं पर ठोस सहमति बनी थी, उन पर एक वर्ष (350 से अधिक दिन) बीत जाने के बाद भी एक इंच प्रगति न होना इस बात का प्रमाण है कि विभागीय संस्कृति समझौतों से मुकरने की आदी हो चुकी है।
अंतिम निर्णय एवं चेतावनी
ज्ञापन में मंत्री दक को स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी गई है कि यदि इस बार भी कोरे आश्वासनों का यह चक्रव्यूह नहीं टूटा, तो प्रदेश का संपूर्ण पैक्स-लैम्पस कर्मचारी वर्ग अपने अस्तित्व की लड़ाई लडऩे के लिए विवश होगा। संघर्ष समिति सर्वसम्मति से यह अंतिम निर्णय लिया है कि यदि 15 अक्टूबर 2026 तक समस्त लंबित मांगों के संबंध में ठोस, स्पष्ट एवं नीतिगत आदेश जारी नहीं किए जाते हैं, तो प्रदेशभर के पैक्स लैम्पस कार्मिक पूर्णत: कार्य बहिष्कार एवं अनिश्चितकालीन हड़ताल का कठोर मार्ग अपनाने के लिए बाध्य होंगे।
संयुक्त संघर्ष समिति के अनुसार, इस आंदोलन के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रशासनिक गतिरोध, अन्नदाता किसानों को फसली ऋण वितरण में आने वाली बाधाओं तथा किसी भी प्रकार की जन-हानि की संपूर्ण नैतिक, प्रशासनिक एवं विधिक जिम्मेदारी शासन और सहकारिता विभाग की होगी।

